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बॉलीवुड में आने से पहले ये काम करते थे फिल्म स्टार्स!

कहते हैं मुंबई मायानगरी है। किसी को रातोरात सितारा बना देती है, तो किसी को कंगाल। पर मायानगरी में जगह बनाना जितना मुश्किल है, उससे कहीं ज्यादा मुश्किल है मौका मिलना। ऐसे में काम की तलाश में आए सितारों की बाद की जिंदगी तो सभी जान जाते हैं, पर अतीत बहुत कम लोग ही जान पाते हैं। आईबीएनखबर.कॉम अपनी इस पेशकश में ऐसे सितारों के बारे में बता रहा है, जो आज बहुत सफल हैं, पर वो फिल्म इंडस्ट्री में आने से पहले कुछ और काम किया करते थे...

बॉलीवुड के ‘खिलाड़ी’ अक्षय कुमार फिल्मों से पहले शेफ थे। वो बैंकॉक में लोगों को अपने हाथों से बने लजीज व्यंजन खिलाया करते थे। वहीं पर उन्होंने मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग ली और फिर बन गए बॉलीवु़ड के मिस्टर खिलाड़ी।

बॉलीवु़ड के शहंशाह अमिताभ बच्चने फिल्मों में आने से पहले कोलकाता की शिपिंग कंपनी में काम किया। उन्होंने रेडियो पर काम करने के लिए भी ट्राई किया, पर दोनों जगहों की विफलता ने उन्हें बॉलीवुड पहुंचाया और आज अमिताभ बच्चन की जगह हर कोई जानता है।

अरशद वारसी इंडस्ट्री के उन सितारों में से हैं, जिनमें धेर सारा टैलेंट है। अरशद फिल्मों में आने से पहले कोरियोग्राफर और डांसर रहे। पर सबसे पहला काम उन्होंने कॉस्मेटिक ऑइटम्स बेचने वाले सेल्समैन का किया।

मिस श्रीलंका रही जैक्लीन फर्नांडिस बॉलीवुड में आने से पहले टीवी रिपोर्टर रही और टीवी इंडस्ट्री में भी काम किया था।

कल्कि कोएचलिन ने इंडस्ट्री में आने से पहले वेटर का काम किया। जो उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए किया।

सैफ अली खान की बहन सोहा अली खान ने फिल्मों में आने से पहले सिटी बैंक में काम किया। उन्हें सबसे पहले बंगाली फिल्म इति श्रीकांत में काम किया और बॉलीवुड में दिल मांगे मोर के साथ शुरुआत की।

सनी लियोनी ने एडल्ट फिल्म इंडस्ट्री में काम करने से पहले जर्मन बेकरी में काम किया। इसके बाद उन्होंने टैक्स और रिटायरमेंट फर्म में काम किया।

नवाजुद्दीन सिद्दीकी आज किसी परिचय के मोहताज नहीं है। पर उन्होंने लंबा संघर्ष किया। नवाजुद्दी ने सबसे पहले एक पेट्रो केमिकल कंपनी में केमिस्ट की जॉब की। इसके बाद उन्हें सरफरोस फिल्म में काम किया। सरफरोस फिल्म में आने से पहले नवाजुद्दी ने दिल्ली में वाचमैन का काम भी किया

बॉलीवुड के किंग शाहरूख खान ने फिल्मों में आने से पहले पार्टियों में सहायक का काम किया। उन्होंने पंकज उधास के गजल की महफिल में भी सहायक का काम कि.या और उन्हें 50 रुपए मिले।

इरफान खान ने अपने दम पर इंडस्ट्री में पहचान बनाई। इरफान ने इंडस्ट्री में आने से पहले ट्यूशन टीचर का काम किया। उन्होंने 25 रुपए माह पर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया।


सौजन्य: IBN7 NEWS

गवाह का दावा, आसाराम के पास 2,000 की फिदायीन फौज

बरेली-आसाराम मामले में नारायण पांडे नाम के एक व्यक्ति ने पुलिस के सामने गवाही दी है कि वह केस से जुड़े एक अहम गवाह की हत्या में शामिल था। उसने पुलिस को एक और चौंकाने वाला बयान दिया है।

पांडे के मुताबिक, आसाराम के पास उसके 2,000 समर्थकों की एक फिदायीन फौज है, जिनका आसाराम के प्रति इतना समर्पण है कि वे उसके लिए कुछ भी कर सकते हैं। पांडे ने पुलिस को बताया कि आसाराम के खिलाफ जाने वाले किसी भी व्यक्ति को यह फिदायीन फौज मार सकती है और जरूरत पड़ने पर ये लोग खुद भी मरने के लिए तैयार रहते हैं।

पांडे की इस अहम गवाही के बाद पुलिस ने शाहजहांपुर की उस पीड़िता की सुरक्षा बढ़ा दी है जिसने आसाराम के खिलाफ बलात्कार का आरोप लगाया था।
सदर बाजार पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर जे.पी.तिवारी ने कहा कि पांडे की गवाही के बाद पुलिस को इस मामले से जुड़े और भी लोगों पर हमले की आशंका है। उन्होंने बताया कि पांडे की गवाही के मुताबिक, फिदायीन टुकड़ी के लोग व आसाराम के कई अन्य सहयोगी पीड़ित लड़की और उसके पिता को मारने की योजना बना रहे हैं। मालूम हो कि जिस गवाह की हत्या बीती 10 जुलाई को की गई थी, वह इंस्पेक्टर तिवारी के ही अधिकार में कैद था।

सौजन्य: INDIATIMES NEWS

जानिए प्राचीन भारत के 11 ऐसे रहस्य जिनपर आपको गर्व होगा

भारतीय इतिहास की शुरुआत को सिंधु घाटी की सभ्यता या फिर बौद्धकाल से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। कुछ इतिहासकार इसे सिकंदर के भारत आगमन से जोड़कर देखते हैं। आज जिसे हम भारतीय इतिहास का प्राचीनकाल कहते हैं, दरअसल वह मध्यकाल था और जिसे मध्यकाल कहते हैं वह राजपूत काल है। तब प्राचीन भारत के इतिहास को जानना जरूरी है।
यदि हम मेहरगढ़ संस्कृति और सभ्यता की बात करें तो वह लगभग 7000 से 3300 ईसा पूर्व अस्तित्व में थी जबकि सिंधु घाटी सभ्यता 3300 से 1700 ईसा पूर्व अस्तित्व में थी। प्राचीन भारत के इतिहास की शुरुआत 1200 ईसापूर्व से 240 ईसा पूर्व के बीच नहीं हुई थी। यदि हम धार्मिक इतिहास के लाखों वर्ष प्राचीन इतिहास को न भी मानें तो संस्कृ‍त और कई प्राचीन भाषाओं के इतिहास के तथ्‍यों के अनुसार प्राचीन भारत के इतिहास की शुरुआत लगभग 13 हजार ईसापूर्व हुई थी अर्थात आज से 15 हजार वर्ष पूर्व।
उक्त 15 हजार वर्षों में भारत ने जहां एक और हिमयुग देखा है तो वहीं उसने जलप्रलय को भी झेला है। उस दौर में भारत में इतना उन्नत, विकसित और सभ्य समाज था जैसा कि आज देखने को मिलता है। इसके अलावा ऐसी कई प्राकृतिक आपदाओं का जिक्र और राजाओं की वंशावली का वर्णन है जिससे भारत के प्राचीन इतिहास की झलक मिलती है। आओ हम जानते हैं प्राचीन भारत के ऐसे 10 रहस्य जिस पर अब विज्ञान भी शोध करने लगा है और अब वह भी इसे सच मानता है।
कुछ विद्वान मानते हैं कि जब अफ्रीका, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया एक थे तब भारत के एक हिस्से मात्र में डायनासोरों का राज था। लेकिन 50 करोड़ वर्ष पूर्व वह युग ‍बीत गया। प्रथम जीव की उत्पत्ति धरती के पेंजिया भूखंड के काल में गोंडवाना भूमि पर हुई थी। गोंडवाना महाद्वीप एक ऐतिहासिक महाद्वीप था। भू-वैज्ञानिकों के अनुसार लगभग 50 करोड़ वर्ष पहले पृथ्वी पर दो महा-महाद्वीप ही थे। उक्त दो महाद्वीपों को वैज्ञानिकों ने दो नाम दिए। एक का नाम था ‘गोंडवाना लैंड’ और दूसरे का नाम ‘लॉरेशिया लैंड’। गोंडवाना लैंड दक्षिण गोलार्ध में था और उसके टूटने से अंटार्कटिका, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिणी अमेरिका और अफ्रीका महाद्वीप का निर्माण हुआ। गोंडवाना लैंड के कुछ हिस्से लॉरेशिया के कुछ हिस्सों से जुड़ गए जिनमें अरब प्रायद्वीप और भारतीय उपमहाद्वीप हैं। गोंडवाना लैंड का नाम भारत के गोंडवाना प्रदेश के नाम पर रखा गया है, क्योंकि यहां शुरुआती जीवन के प्रमाण मिले हैं। फिर 13 करोड़ साल पहले जब यह धरती 5 द्वीपों वाली बन गई, तब जीव-जगत का विस्तार हुआ। उसी विस्तार क्रम में आगे चलकर कुछ लाख वर्ष पूर्व मानव की उत्पत्ति हुई।
धरती का पहला मानव कौन था?
जीवन का विकास सर्वप्रथम भारतीय दक्षिण प्रायद्वीप में नर्मदा नदी के तट पर हुआ, जो विश्व की सर्वप्रथम नदी है। यहां डायनासोरों के सबसे प्राचीन अंडे एवं जीवाश्म प्राप्त हुए हैं। भारत के सबसे पुरातन आदिवासी गोंडवाना प्रदेश के गोंड संप्रदाय की पुराकथाओं में भी यही तथ्य वर्णित है। गोंडवाना मध्यभारत का ऐतिहासिक क्षेत्र है जिसमें मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र राज्य के हिस्से शामिल हैं। गोंड नाम की जाति आर्य धर्म की प्राचीन जातियों में से एक है, जो द्रविड़ समूह से आती है। उल्लेखनीय है कि आर्य नाम की कोई जाति नहीं होती थी। जो भी जाति आर्य धर्म का पालन करती थी उसे आर्य कहा जाता था।
पहला मानव : प्राचीन भारत के इतिहास के अनुसार मानव कई बार बना और कई बार फना हो गया। एक मन्वंतर के काल तक मानव सभ्यता जीवित रहती है और फिर वह काल बीत जाने पर संपूर्ण धरती अपनी प्रारंभिक अवस्था में पहुंच जाती है। लेकिन यह तो हुई धर्म की बात इसमें सत्य और तथ्य कितना है?
दुनिया व भारत के सभी ग्रंथ यही मानते हैं कि मानव की उत्पत्ति भारत में हुई थी। हालांकि भारतीय ग्रंथों में मानव की उत्पत्ति के दो सिद्धांत मिलते हैं- पहला मानव को ब्रह्मा ने बनाया था और दूसरा मनुष्य का जन्म क्रमविकास का परिणाम है। प्राचीनकाल में मनुष्य आज के मनुष्य जैसा नहीं था। जलवायु परिवर्तन के चलते उसमें भी बदलाव होते गए।
हालांकि ग्रंथ कहते हैं कि इस मन्वंतर के पहले मानव की उत्पत्ति वितस्ता नदी की शाखा देविका नदी के तट पर हुई थी। यह नदी कश्मीर में है। वेद के अनुसार प्रजापतियों के पुत्रों से ही धरती पर मानव की आबादी हुई। आज धरती पर जितने भी मनुष्य हैं सभी प्रजापतियों की संतानें हैं।
संस्कृत विश्व की सबसे प्राचीन भाषा है तथा समस्त भारतीय भाषाओं की जननी है। ‘संस्कृत’ का शाब्दिक अर्थ है ‘परिपूर्ण भाषा’। संस्कृत से पहले दुनिया छोटी-छोटी, टूटी-फूटी बोलियों में बंटी थी जिनका कोई व्याकरण नहीं था और जिनका कोई भाषा कोष भी नहीं था। कुछ बोलियों ने संस्कृत को देखकर खुद को विकसित किया और वे भी एक भाषा बन गईं।
सभी भाषाओं की जननी संस्कृत
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ब्राह्मी और देवनागरी लिपि : भाषा को लिपियों में लिखने का प्रचलन भारत में ही शुरू हुआ। भारत से इसे सुमेरियन, बेबीलोनीयन और यूनानी लोगों ने सीखा। प्राचीनकाल में ब्राह्मी और देवनागरी लिपि का प्रचलन था। ब्राह्मी और देवनागरी लिपियों से ही दुनियाभर की अन्य लिपियों का जन्म हुआ। ब्राह्मी लिपि एक प्राचीन लिपि है जिससे कई एशियाई लिपियों का विकास हुआ है। महान सम्राट अशोक ने ब्राह्मी लिपि को धम्मलिपि नाम दिया था। ब्राह्मी लिपि को देवनागरी लिपि से भी प्राचीन माना जाता है। कहा जाता है कि यह प्राचीन सिन्धु-सरस्वती लिपि से निकली लिपि है। हड़प्पा संस्कृति के लोग इस लिपि का इस्तेमाल करते थे, तब संस्कृत भाषा को भी इसी लिपि में लिखा जाता था।
शोधकर्ताओं के अनुसार देवनागरी, बांग्ला लिपि, उड़िया लिपि, गुजराती लिपि, गुरुमुखी, तमिल लिपि, मलयालम लिपि, सिंहल लिपि, कन्नड़ लिपि, तेलुगु लिपि, तिब्बती लिपि, रंजना, प्रचलित नेपाल, भुंजिमोल, कोरियाली, थाई, बर्मेली, लाओ, खमेर, जावानीज, खुदाबादी लिपि, यूनानी लिपि आदि सभी लिपियों की जननी है ब्राह्मी लिपि।
कहते हैं कि चीनी लिपि 5,000 वर्षों से ज्यादा प्राचीन है। मेसोपोटामिया में 4,000 वर्ष पूर्व क्यूनीफॉर्म लिपि प्रचलित थी। इसी तरह भारतीय लिपि ब्राह्मी के बारे में भी कहा जाता है। जैन पौराणिक कथाओं में वर्णन है कि सभ्यता को मानवता तक लाने वाले पहले तीर्थंकर ऋषभदेव की एक बेटी थी जिसका नाम ब्राह्मी था और कहा जाता है कि उसी ने लेखन की खोज की। यही कारण है कि उसे ज्ञान की देवी सरस्वती के साथ जोड़ते हैं। हिन्दू धर्म में सरस्वती को शारदा भी कहा जाता है, जो ब्राह्मी से उद्भूत उस लिपि से संबंधित है, जो करीब 1500 वर्ष से अधिक पुरानी है।
केरल के एर्नाकुलम जिले में कलादी के समीप कोट्टानम थोडू के आसपास के इलाकों से मिली कुछ कलात्मक वस्तुओं पर ब्राह्मी लिपि खुदी हुई पाई गई है, जो नवपाषाणकालीन है। यह खोज इलाके में महापाषाण और नवपाषाण संस्कृति के अस्तित्व पर प्रकाश डालती है। पत्थर से बनी इन वस्तुओं का अध्ययन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के वैज्ञानिक और केरल विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के पुरातत्वविद डॉ. पी. राजेन्द्रन द्वारा किया गया। ये वस्तुएं एर्नाकुलम जिले में मेक्कालादी के अंदेथ अली के संग्रह का हिस्सा हैं। राजेन्द्रन ने बताया कि मैंने कलादी में कोट्टायन के आसपास से अली द्वारा संग्रहीत कलात्मक वस्तुओं के विशाल भंडार का अध्ययन किया। इन वस्तुओं में नवपाषणकालीन और महापाषाणकालीन से संबंधित वस्तुएं भी हैं। उन्होंने बताया कि नवपाषाणकलीन कुल्हाड़ियों का अध्ययन करने के बाद पाया गया कि ऐसी 18 कुल्हाड़ियों में से 3 पर गुदी हुई लिपि ब्राह्मी लिपि है।
प्राचीन दुनिया में कुछ नदियां प्रमुख नदियां थीं जिनमें एक ओर सिंधु-सरस्वती और गंगा और नर्मदा थीं, तो दूसरी ओर दजला-फरात और नील नदियां थीं। दुनिया की प्रारंभिक मानव आबादी इन नदियों के पास ही बसी थीं जिसमें सिंधु और सरस्वती नदी के किनारे बसी सभ्यता सबसे समृद्ध, सभ्य और बुद्धिमान थी। इसके कई प्रमाण मौजूद हैं। दुनिया का पहला धार्मिक ग्रंथ सरस्वती नदी के किनारे बैठकर ही लिखा गया था।
एक और जहां दजला और फरात नदी के किनारे मोसोपोटामिया, सुमेरियन, असीरिया और बेबीलोन सभ्यता का विकास हुआ तो दूसरी ओर मिस्र की सभ्यता का विकास 3400 ईसा पूर्व नील नदी के किनारे हुआ। इसी तरह भारत में एक ओर सिंधु और सरस्वती नदी के किनारे सिंधु, हड़प्पा, मोहनजोदड़ो आदि सभ्यताओं का विकास हुआ तो दूसरी ओर गंगा और नर्मदा के किनारे प्राचीन भारत का समाज निर्मित हुआ।
प्राप्त शोधानुसार सिंधु और सरस्वती नदी के बीच जो सभ्यता बसी थी वह दुनिया की सबसे प्राचीन और समृद्ध सभ्यता थी। यह वर्तमान में अफगानिस्तान से भारत तक फैली थी। प्राचीनकाल में जितनी विशाल नदी सिंधु थी उससे कई ज्यादा विशाल नदी सरस्वती थी।
शोधानुसार यह सभ्यता लगभग 9,000 ईसा पूर्व अस्तित्व में आई थी और 3,000 ईसापूर्व उसने स्वर्ण युग देखा और लगभग 1800 ईसा पूर्व आते-आते यह लुप्त हो गया। कहा जाता है कि 1,800 ईसा पूर्व के आसपास किसी भयानक प्राकृतिक आपदा के कारण एक और जहां सरस्वती नदी लुप्त हो गई वहीं दूसरी ओर इस क्षेत्र के लोगों ने पश्‍चिम की ओर पलायन कर दिया। पुरात्ववेत्ता मेसोपोटामिया (5000- 300 ईसापूर्व) को सबसे प्राचीन बताते हैं, लेकिन अभी सरस्वती सभ्यता पर शोध किए जाने की आवश्यकता है।
प्राचीन अंतरिक्ष विज्ञान के संबंध में खोज करने वाले एरिक वॉन डेनिकन तो यही मानते हैं कि भारत में ऐसी कई जगहें हैं, जहां एलियंस रहते थे जिन्हें वे आकाश के देवता कहते हैं।
हाल ही में भारत के एक खोजी दल ने कुछ गुफाओं में ऐसे भित्तिचित्र देखे हैं, जो कई हजार वर्ष पुराने हैं। प्रागैतिहासिक शैलचित्रों के शोध में जुटी एक संस्था ने रायसेन के करीब 70 किलोमीटर दूर घने जंगलों के शैलचित्रों के आधार पर अनुमान जताया है कि प्रदेश के इस हिस्से में दूसरे ग्रहों के प्राणी ‘एलियन’ आए होंगे।
ऐसा नहीं है कि मिसाइलों या परमाणु अस्त्र का आविष्कार आज ही हुआ है। रामायण काल में भी परमाणु अस्त्र छोड़ा गया था और महाभारत काल में भी। इसके अलावा ऐसे भी कई अस्त्र और शस्त्र थे जिनके बारे में जानकर आप आश्चर्य करेंगे। विज्ञान इस तरह के अस्त्र और शस्त्र बनाने में अभी सफल नहीं हुआ है। हालांकि लक्ष्य का भेदकर लौट आने वाले अस्त्र वह बना चुका है।
उदाहरण के तौर पर एरिक वॉन अपनी बेस्ट सेलर पुस्तक ‘चैरियट्स ऑफ गॉड्स’ में लिखते हैं, ‘लगभग 5,000 वर्ष पुरानी महाभारत के तत्कालीन कालखंड में कोई योद्धा किसी ऐसे अस्त्र के बारे में कैसे जानता था जिसे चलाने से 12 साल तक उस धरती पर सूखा पड़ जाता, ऐसा कोई अस्त्र जो इतना शक्तिशाली हो कि वह माताओं के गर्भ में पलने वाले शिशु को भी मार सके? इसका अर्थ है कि ऐसा कुछ न कुछ तो था जिसका ज्ञान आगे नहीं बढ़ाया गया अथवा लिपिबद्ध नहीं हुआ और गुम हो गया।’
प्राचीन भारत बहुत ही समृद्ध और सभ्य देश था, जहां हर तरह के अत्याधुनिक हथियार थे, तो वहीं मानव के मनोरंजन के भरपूर साधन भी थे। एक ओर जहां शतरंज का आविष्कार भारत में हुआ वहीं फुटबॉल खेल का जन्म भी भारत में ही हुआ है। भगवान कृष्ण की गेंद यमुना में चली जाने का किस्सा बहुत चर्चित है तो दूसरी ओर भगवान राम के पतंग उड़ाने का उल्लेख भी मिलता है।
कहने का तात्पर्य यह कि ऐसा कोई-सा खेल या मनोरंजन का साधन नहीं है जिसका आविष्कार भारत में न हुआ हो। भारत में प्राचीनकाल से ही ज्ञान को अत्यधिक महत्व दिया गया है। कला, विज्ञान, गणित और ऐसे अनगिनत क्षेत्र हैं जिनमें भारतीय योगदान अनुपम है। आधुनिक युग के ऐसे बहुत से आविष्कार हैं, जो भारतीय शोधों के निष्कर्षों पर आधारित हैं।
प्राचीन भारतीयों ने एक और जहां पिरामिडनुमा मंदिर बनाए तो दूसरी ओर स्तूपनुमा मंदिर बानकर दुनिया को चमत्कृत कर दिया। आज दुनियाभर के धर्म के प्रार्थना स्थल इसी शैली में बनते हैं। मिश्र के पिरामिडों के बाद हिन्दू मंदिरों को देखना सबसे अद्भुत माना जाता था। प्राचीनकाल के बाद मौर्य और गुप्त काल में मंदिरों को नए सिरे से बनाया गया और मध्यकाल में उनमें से अधिकतर मंदिरों का विध्वंस किया गया। माना जाता है कि किसी समय ताजमहल भी एक शिव मंदिर ही था। कुतुबमीनार विष्णु स्तंभ था। अयोध्या में महाभारतकाल का एक प्राचीन और भव्य मंदिर था जिसे तोड़ दिया गया।
मौर्य, गुप्त और विजयनगरम साम्राज्य के दौरान बने हिन्दू मंदिरों की स्थापत्य कला को देखकर हर कोई दांतों तले अंगुली दबाए बिना नहीं रह पाता। अजंता-एलोरा की गुफाएं हों या वहां का विष्णु मंदिर। कोणार्क का सूर्य मंदिर हो या जगन्नाथ मंदिर या कंबोडिया के अंकोरवाट का मंदिर हो या थाईलैंड के मंदिर… उक्त मंदिरों से पता चलता है कि प्राचीनकाल में खासकर महाभारतकाल में किस तरह के मंदिर बने होंगे। समुद्र में डूबी कृष्ण की द्वारिका के अवशेषों की जांच से पता चलता है कि आज से 5,000 वर्ष पहले भी मंदिर और महल इतने भव्य होते थे जितने कि मध्यकाल में बनाए गए थे।
रहस्यों से भरे मंदिर : ऐसे कई मंदिर हैं, जहां तहखानों में लाखों टन खजाना दबा हुआ है। उदाहरणार्थ केरल के श्रीपद्मनाभ स्वामी मंदिर के 7 तहखानों में लाखों टन सोना दबा हुआ है। उसके 6 तहखानों में से करीब 1 लाख करोड़ का खजाना तो निकाल लिया गया है, लेकिन 7वें तहखाने को खोलने पर राजपरिवार ने सुप्रीम कोर्ट से आदेश लेकर रोक लगा रखी है। आखिर ऐसा क्या है उस तहखाने में कि जिसे खोलने से वहां तबाही आने की आशंका जाहिर की जा रही है? कहते हैं उस तहखाने का दरवाजा किसी विशेष मंत्र से बंद है और वह उसी मंत्र से ही खुलेगा।
वृंदावन का एक मंदिर अपने आप ही खुलता और बंद हो जाता है। कहते हैं कि निधिवन परिसर में स्थापित रंगमहल में भगवान कृष्ण रात में शयन करते हैं। रंगमहल में आज भी प्रसाद के तौर पर माखन-मिश्री रोजाना रखा जाता है। सोने के लिए पलंग भी लगाया जाता है। सुबह जब आप इन बिस्तरों को देखें, तो साफ पता चलेगा कि रात में यहां जरूर कोई सोया था और प्रसाद भी ग्रहण कर चुका है। इतना ही नहीं, अंधेरा होते ही इस मंदिर के दरवाजे अपने आप बंद हो जाते हैं इसलिए मंदिर के पुजारी अंधेरा होने से पहले ही मंदिर में पलंग और प्रसाद की व्यवस्था कर देते हैं।
मान्यता के अनुसार यहां रात के समय कोई नहीं रहता है। इंसान छोड़िए, पशु-पक्षी भी नहीं। ऐसा बरसों से लोग देखते आए हैं, लेकिन रहस्य के पीछे का सच धार्मिक मान्यताओं के सामने छुप-सा गया है। यहां के लोगों का मानना है कि अगर कोई व्यक्ति इस परिसर में रात में रुक जाता है तो वह तमाम सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।
प्राचीन भारत में एक ओर जहां आसमान में विमान उड़ते थे वहीं नदियों में नाव और समुद्र में जहाज चलते थे। रामायण काल में भगवान राम एक नाव में सफर करके ही गंगा पार करते हैं तो वे दूसरी ओर उनके द्वारा पुष्पक विमान से ही अयोध्या लौटने का वर्णन मिलता हैं। दूसरी ओर संस्कृत और अन्य भाषाओं के ग्रंथों में इस बात के कई प्रमाण मिलते हैं कि भारतीय लोग समुद्र में जहाज द्वारा अरब और अन्य देशों की यात्रा करते थे।
प्राचीन भारत के शोधकर्ता मानते हैं कि रामायण और महाभारतकाल में विमान होते थे जिसके माध्यम से विशिष्टजन एक स्थान से दूसरे स्थान पर सुगमता से यात्रा कर लेते थे। विष्णु, रावण, इंद्र, बालि आदि सहित कई देवी और देवताओं के अलावा मानवों के पास अपने खुद के विमान हुआ करते थे। विमान से यात्रा करने की कई कहानियां भारतीय ग्रंथों में भरी पड़ी हैं। यहीं नहीं, कई ऐसे ऋषि और मुनि भी थे, जो अंतरिक्ष में किसी दूसरे ग्रहों पर जाकर पुन: धरती पर लौट आते थे।
वर्तमान समय में भारत की इस प्राचीन तकनीक और वैभव का खुलासा कोलकाता संस्कृत कॉलेज के संस्कृत प्रोफेसर दिलीप कुमार कांजीलाल ने 1979 में एंशियंट एस्ट्रोनट सोसाइटी (Ancient Astronaut Society) की म्युनिख (जर्मनी) में संपन्न छठी कांग्रेस के दौरान अपने एक शोध पत्र से किया। उन्होंने उड़ सकने वाले प्राचीन भारतीय विमानों के बारे में एक उद्बोधन दिया और पर्चा प्रस्तुत किया।
संगीत और वाद्ययंत्रों का अविष्कार भारत में ही हुआ है। संगीत का सबसे प्राचीन ग्रंथ सामवेद है। हिन्दू धर्म का नृत्य, कला, योग और संगीत से गहरा नाता रहा है। हिन्दू धर्म मानता है कि ध्वनि और शुद्ध प्रकाश से ही ब्रह्मांड की रचना हुई है। आत्मा इस जगत का कारण है। चारों वेद, स्मृति, पुराण और गीता आदि धार्मिक ग्रंथों में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को साधने के हजारोहजार उपाय बताए गए हैं। उन उपायों में से एक है संगीत। संगीत की कोई भाषा नहीं होती। संगीत आत्मा के सबसे ज्यादा नजदीक होता है। शब्दों में बंधा संगीत विकृत संगीत माना जाता है।
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प्राचीन परंपरा : भारत में संगीत की परंपरा अनादिकाल से ही रही है। हिन्दुओं के लगभग सभी देवी और देवताओं के पास अपना एक अलग वाद्य यंत्र है। विष्णु के पास शंख है तो शिव के पास डमरू, नारद मुनि और सरस्वती के पास वीणा है, तो भगवान श्रीकृष्ण के पास बांसुरी। खजुराहो के मंदिर हो या कोणार्क के मंदिर, प्राचीन मंदिरों की दीवारों में गंधर्वों की मूर्तियां आवेष्टित हैं। उन मूर्तियों में लगभग सभी तरह के वाद्य यंत्र को दर्शाया गया है। गंधर्वों और किन्नरों को संगीत का अच्छा जानकार माना जाता है।
सामवेद उन वैदिक ऋचाओं का संग्रह मात्र है, जो गेय हैं। संगीत का सर्वप्रथम ग्रंथ चार वेदों में से एक सामवेद ही है। इसी के आधार पर भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र लिखा और बाद में संगीत रत्नाकर, अभिनव राग मंजरी लिखा गया। दुनियाभर के संगीत के ग्रंथ सामवेद से प्रेरित हैं।
संगीत का विज्ञान : हिन्दू धर्म में संगीत मोक्ष प्राप्त करने का एक साधन है। संगीत से हमारा मन और मस्तिष्क पूर्णत: शांत और स्वस्थ हो सकता है। भारतीय ऋषियों ने ऐसी सैकड़ों ध्वनियों को खोजा, जो प्रकृति में पहले से ही विद्यमान है। उन ध्वनियों के आधार पर ही उन्होंने मंत्रों की रचना की, संस्कृत भाषा की रचना की और ध्यान में सहायक ध्यान ध्वनियों की रचना की। इसके अलावा उन्होंने ध्वनि विज्ञान को अच्छे से समझकर इसके माध्यम से शास्‍‍त्रों की रचना की और प्रकृति को संचालित करने वाली ध्वनियों की खोज भी की। आज का विज्ञान अभी भी संगीत और ध्वनियों के महत्व और प्रभाव की खोज में लगा हुआ है, लेकिन ऋषि-मु‍नियों से अच्छा कोई भी संगीत के रहस्य और उसके विज्ञान को नहीं जान सकता।
प्राचीन भारतीय संगीत दो रूपों में प्रचलन में था-1. मार्गी और 2. देशी। मार्गी संगीत तो लुप्त हो गया लेकिन देशी संगीत बचा रहा जिसके मुख्यत: दो विभाजन हैं- 1. शास्त्रीय संगीत और 2. लोक संगीत।
शास्त्रीय संगीत शास्त्रों पर आधारित और लोक संगीत काल और स्थान के अनुरूप प्रकृति के स्वच्छंद वातावरण में स्वाभाविक रूप से पलता हुआ विकसित होता रहा। हालांकि शास्त्रीय संगीत को विद्वानों और कलाकरों ने अपने-अपने तरीके से नियमबद्ध और परिवर्तित किया और इसकी कई प्रांतीय शैलियां विकसित होती चली गईं तो लोक संगीत भी अलग-अलग प्रांतों के हिसाब से अधिक समृद्ध होने लगा।
बदलता संगीत : मुस्लिमों के शासनकाल में प्राचीन भारतीय संगीत की समृद्ध परंपरा को अरबी और फारसी में ढालने के लिए आवश्यक और अनावश्यक और रुचि के अनुसार उन्होंने इसमें अनेक परिवर्तन किए। उन्होंने उत्तर भारत की संगीत परंपरा का इस्लामीकरण करने का कार्य किया जिसके चलते नई शैलियां भी प्रचलन में आईं, जैसे खयाल व गजल आदि। बाद में सूफी आंदोलन ने भी भारतीय संगीत पर अपना प्रभाव जमाया। आगे चलकर देश के विभिन्न हिस्सों में कई नई पद्धतियों व घरानों का जन्म हुआ। ब्रिटिश शासनकाल के दौरान पाश्चात्य संगीत से भी भारतीय संगीत का परिचय हुआ। इस दौर में हारमोनियम नामक वाद्य यंत्र प्रचलन में आया।
दो संगीत पद्धतियां : इस तरह वर्तमान दौर में हिन्दुस्तानी संगीत और कर्नाटकी संगीत प्रचलित है। हिन्दुस्तानी संगीत मुगल बादशाहों की छत्रछाया में विकसित हुआ और कर्नाटक संगीत दक्षिण के मंदिरों में विकसित होता रहा।
हिन्दुस्तानी संगीत : यह संगीत उत्तरी हिन्दुस्तान में- बंगाल, बिहार, उड़ीसा, उत्तरप्रदेश, हरियाणा, पंजाब, गुजरात, जम्मू-कश्मीर तथा महाराष्ट्र प्रांतों में प्रचलित है।
कर्नाटक संगीत :  यह संगीत दक्षिण भारत में तमिलनाडु, मैसूर, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश आदि दक्षिण के प्रदेशों में प्रचलित है।
वाद्य यंत्र : मुस्लिम काल में नए वाद्य यंत्रों की भी रचना हुई, जैसे सरोद और सितार। दरअसल, ये वीणा के ही बदले हुए रूप हैं। इस तरह वीणा, बीन, मृदंग, ढोल, डमरू, घंटी, ताल, चांड, घटम्, पुंगी, डंका, तबला, शहनाई, सितार, सरोद, पखावज, संतूर आदि का आविष्कार भारत में ही हुआ है। भारत की आदिवासी जातियों के पास विचित्र प्रकार के वाद्य यंत्र मिल जाएंगे जिनसे निकलने वाली ध्वनियों को सुनकर आपके दिलोदिमाग में मदहोशी छा जाएगी।
उपरोक्त सभी तरह की संगीत पद्धतियों को छोड़कर आओ हम जानते हैं, हिन्दू धर्म के धर्म-कर्म और क्रियाकांड में उपयोग किए जाने वाले उन 10 प्रमुख वाद्य यंत्रों को जिनकी ध्वनियों को सुनकर जहां घर का वस्तु दोष मिटता है वहीं मन और मस्तिष्क भी शांत हो जाता है।
प्राचीन भारती नृत्य शैली से ही दुनियाभर की नृत्य शैलियां विकसित हुई है। भारतीय नृत्य मनोरंजन के लिए नहीं बना था। भारतीय नृत्य ध्यान की एक विधि के समान कार्य करता है। इससे योग भी जुड़ा हुआ है। सामवेद में संगीत और नृत्य का उल्लेख मिलता है। भारत की नृत्य शैली की धूम सिर्फ भारत ही में नहीं अपितु पूरे विश्व में आसानी से देखने को मिल जाती है।
हड़प्पा सभ्यता में नृत्य करती हुई लड़की की मूर्ति पाई गई है, जिससे साबित होता है कि इस काल में ही नृत्यकला का विकास हो चुका था। भरत मुनि का नाट्य शास्त्र नृत्यकला का सबसे प्रथम व प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है। इसको पंचवेद भी कहा जाता है। इंद्र की साभ में नृत्य किया जाता था। शिव और पार्वती के नृत्य का वर्णन भी हमें पुराणों में मिलता है।
नाट्यशास्त्र अनुसार भारत में कई तरह की नृत्य शैलियां विकसित हुई जैसे भरतनाट्यम, चिपुड़ी, ओडिसी, कत्थक, कथकली, यक्षगान, कृष्णअट्टम, मणिपुरी और मोहिनी अट्टम। इसके अलावा भारत में कई स्थानीय संस्कृति और आदिवासियों के क्षेत्र में अद्भुत नृत्य देखने को मिलता है जिसमें से राजस्थान के मशहूर कालबेलिया नृत्य को यूनेस्को की नृत्य सूची में शामिल किया गया है।
मुगल काल में भारतीय संगीत, वाद्य और नृत्य को इस्लामिक शैली में ढालने का प्रासास किया गया जिसके चलते उत्तर भारती संगीत, वाद्य और नृत्य में बदलाव हो गया।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मुख्यत पांच प्रकार की होती है स्त्रियां, जानिए उनके लक्षण और स्वभाव

ज्योतिष शास्त्र में पुरुषो और स्त्रियों के प्रकार के बारे में भी लिखा गया है।  हालांकि पुरुषों के बारे में तो कुछ ज्यादा नहीं लिखा गया लेकिन स्त्रियां कितने प्रकार की होती है उनके लक्षण क्या होते है उनका स्वाभाव कैसा होता है इन बारे में काफी कुछ लिखा गया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार स्त्रियों को मुख्यतः निम्न पांंच वर्गों में बाटा गया है –

1. शंखिनी (Shankhini)
शंखिनी स्वभाव की स्त्रियां अन्य स्त्रियों से थोड़ी लंबी होती हैं। इनमें से कुछ मोटी और कुछ दुर्बल होती हैं। इनकी नाक मोटी, आंखें अस्थिर और आवाज गंभीर होती है। ये हमेशा अप्रसन्न ही दिखाई देती हैं और बिना कारण ही क्रोध किया करती हैं।

ये पति से रूठी रहती हैं, पति की बात मानना इन्हें गुलामी की तरह लगता है। इनका मन सदैव भोग-विलास में डूबा रहता है। इनमें दया भाव भी नहीं होता। इसलिए ये परिवार में रहते हुए भी उनसे अलग ही रहती हैं। ऐसी स्त्रियां संसार में अधिक होती हैं।

ऐसी लड़कियां चुगली करने वाली यानी इधर की बात उधर करने वाली होती हैं। ये अधिक बोलती हैं। इसलिए लोग इनके सामने कम ही बोलते हैं। इनकी आयु लंबी होती हैं। इनके सामने ही दोनों कुल (पिता व पति) नष्ट हो जाते हैं। अंत समय में बहुत दु:ख भोगती हैं। ये उस समय मरने की बारंबार इच्छा करती हैं, लेकिन इनकी मृत्यु नहीं होती।


 2. चित्रिणी(Chitrini) :-चित्रिणी स्त्रियां पतिव्रता, स्वजनों पर स्नेह करने वाली होती हैं। ये हर कार्य बड़ी ही शीघ्रता से करती हैं। इनमें भोग की इच्छा कम होती है। श्रृंगार आदि में इनका मन अधिक लगता है। इनसे अधिक मेहनत वाला काम नहीं होता, परंतु ये बुद्धिमान और विदुषी होती हैं।

गाना-बजाना और चित्रकला इन्हें विशेष प्रिय होता है। ये तीर्थ, व्रत और साधु-संतों की सेवा करने वाली होती हैं। ये दिखने में बहुत ही सुंदर होती हैं।

इनका मस्तक गोलाकार, अंग कोमल और आंखें चंचल होती हैं। इनका स्वर कोयल के समान होता है। बाल काले होते हैं। इस जाति की लड़कियां बहुत कम होती हैं। यदि इनका जन्म गरीब परिवार में भी हो तो ये अपने भविष्य में पटरानी के समान सुख भोगती हैं।

अधिक संतान होने पर भी इनकी लगभग तीन संतान ही जीवित रहती हैं, उनमें से एक को राजयोग होता है। इस जाति की लड़कियों की आयु लगभग 48 वर्ष होती है।


3. हस्तिनी (Hastini):- इस जाति की लड़कियों का स्वभाव बदलता रहता है। इनमें भोग-विलास की इच्छा अधिक होती है। ये हंसमुख स्वभाव की होती हैं और भोजन अधिक करती हैं। इनका शरीर थोड़ा मोटा होता है। ये प्राय: आलसी होती हैं।

इनके गाल, नाक, कान और व मस्तक का रंग गोरा होता है। इन्हें क्रोध अधिक आता है। कभी-कभी इनका स्वभाव बहुत क्रूर हो जाता है। इनके पैरों की उंगलियां टेढ़ी-मेढ़ी होती हैं। इनकी संतानों में लड़के अधिक होते हैं। ये बिना रोग के ही रोगी बनी रहती हैं। इनका पति सुंदर और गुणवान होता है।

अपने झगड़ालू स्वभाव के कारण ये परिवार को क्लेश पहुंचाती हैं। इनके पति इनसे दु:खी होते हैं। धार्मिक कार्यों के प्रति इनकी आस्था नहीं होती। इन्हें स्वादिष्ट भोजन पसंद होता है। इनकी परम आयु 73 वर्ष होती है। विवाह के 4, 8, 12 अथवा 16वे वर्ष में इनके पति का भाग्योदय होता है। इनके कई गर्भ खंडित हो जाते हैं। इन्हें अपने जीवन में अनेक कष्ट झेलने पड़ते हैं, लेकिन इसका कारण भी ये स्वयं ही होती हैं। इनके दुष्ट स्वभाव के कारण ही परिवार में भी इनकी पूछ-परख नहीं होती।


4. पुंश्चली (Punshchali) :- पुंश्चली स्वभाव की लड़कियों के मस्तक का चमकीला बिंदु भी मलीन दिखाई देता है। इस स्वभाव वाली महिलाएं अपने परिवार के लिए दु:ख का कारण बनती हैं।

इनमें लज्जा नहीं होती और ये अपने हाव-भाव से कटाक्ष करने वाली होती हैं। इनके हाथ में नव रेखाएं होती हैं जो सिद्ध (पुण्य, पद्म), स्वस्तिक आदि उत्तम रेखाओं से रहित होती हैं। इनका मन अपने पति की अपेक्षा पर पुरुषों में अधिक लगता है। इसलिए कोई इनका मान-सम्मान नहीं करता। सभी इनकी अपेक्षा करते हैं।
पुंश्चली स्त्रियों में युवावस्था के लक्षण 12 वर्ष की आयु में ही दिखाई देने लगते हैं। इनकी आंखें बड़ी और हाथ-पैर छोटे होते हैं। स्वर तीखा होता है।

यदि ये किसी से सामान्य रूप से बात भी करती हैं तो ऐसा लगता है कि जैसे ये विवाद कर रही हैं। इनकी भाग्य रेखा व पुण्य रेखा छिन्न-भिन्न रहती है। इनके हाथ में दो शंख रेखाएं व नाक पर तिल होता है।


5. पद्मिनी (Padmini) :- समुद्र शास्त्र के अनुसार पद्मिनी स्त्रियां सुशील, धर्म में विश्वास रखने वाली, माता-पिता की सेवा करने वाली व अति सुंदर होती हैं। इनके शरीर से कमल के समान सुगंध आती है। यह लंबे कद व कोमल बालों वाली होती हैं। इसकी बोली मधुर होती है। पहली नजर में ही ये सभी को आकर्षित कर लेती हैं। इनकी आंखें सामान्य से थोड़ी बड़ी होती हैं। ये अपने पति के प्रति समर्पित रहती हैं।

इनके नाक, कान और हाथ की उंगलियां छोटी होती हैं। इसकी गर्दन शंख के समान रहती है व इनके मुख पर सदा प्रसन्नता दिखाई देती है।पद्मिनी स्त्रियां प्रत्येक बड़े पुरुष को पिता के समान, अपनी उम्र के पुरुषों को भाई तथा छोटों को पुत्र के समान समझती हैं।

यह देवता, गंधर्व, मनुष्य सबका मन मोह लेने में सक्षम होती हैं। यह सौभाग्यवती, अल्प संतान वाली, पतिव्रताओं में श्रेष्ठ, योग्य संतान उत्तपन्न करने वाली तथा आश्रितों का पालन करने वाली होती हैं।

इन्हें लाल वस्त्र अधिक प्रिय होते हैं। इस जाति की लड़कियां बहुत कम होती हैं। जिनसे इनका विवाह होता है, वह पुरुष भी भाग्यशाली होता है।

महादेवशाल धाम – जहाँ होती है खंडित शिवलिंग की पूजा – गई थी एक ब्रिटिश इंजीनियर की जान

हमारे शास्त्रों में शिवजी सहित किसी  भी देवता की खंडित मूर्ति की पूजा करने की मनाही है लेकिन शिवलिंग एक अपवाद है वो चाहे कितना भी खंडित हो जाए , सदैव पूजनीय है।   इसका जीता-जागता उदाहरण झारखंड के गोइलकेरा में स्तिथ महादेवशाल धाम मंदिर में देख सकते है। इस मंदिर में एक खंडित शिवलिंग की पूजा पिछले 150 सालों से हो रही है।  इस शिवलिंग की कहानी भी बड़ी अचरज़ भरी है इस शिवलिंग को तोड़ने के कारण एक ब्रिटिश इंजीनियर को अपनी जान गवानी पड़ी थी।

यह कहानी है 19 वी शताब्दी के मध्य की जब गोइलेकेरा के बड़ैला गाँव के पास बंगाल-नागपुर रेलवे द्वारा कलकत्ता से मुंबई के बीच रेलवे लाइन बिछाने का कार्य चल रहा था। इसके लिए जब मजदूर वहां खुदाई कर रहे थे तो उन्हें खुदाई करते हुए एक शिवलिंग दिखाई दिया। मजदूरों ने शिवलिंग देखते ही खुदाई रोक दी और आगे काम करने से मन कर दिया। लेकिन वहां मौजूद ब्रिटिश इंजीनियर ‘रॉबर्ट हेनरी’ ने इस सब को बकवास बताते हुए फावड़ा उठाया  शिवलिंग पर प्रहार कर दिया जिससे की शिवलिंग दो टुकड़ो में बट गया पर इसका परिणाम अच्छा नहीं हुआ और शाम को काम से लौटते वक़्त उस इंजीनियर की रास्ते में ही मौत हो गई।

 इस घटना के बाद मजदूरो और ग्रामीणो ने रेलवे लाइन की खुदाई का जोरदार विरोध किया।  पहले तो अंग्रेज़ अधिकारी वही पर खुदाई करने पर अड़े रहे पर जब उन्हें महसूस हुआ की यह आस्था एवं विश्वास की बात है और ज़बरदस्ती करने के उलटे परिणाम हो सकते है तो उन्होंने रेलवे लाइन के लिए शिवलिंग से दूर  खुदाई करने का फैसला किया। इसके कारण रेलवे लाइन की दिशा बदलनी पड़ी और दो सुरंगो का निर्माण करना पड़ा।
शिवलिंग के दोनों टुकड़ो की होती है पूजा :
खुदाई में जहां शिवलिंग निकला था आज वहां देवशाल मंदिर है तथा खंडित शिवलिंग मंदिर के गर्भगृह में स्थापित है। जबकि शिवलिंग का दूसरा टुकड़ा वहां से दो किलोमीटर दूर रतनबुर पहाड़ी पर ग्राम देवी ‘माँ पाउडी’ के साथ स्थापित है जहां दोनों की नित्य पूजा-अर्चना होती है। परम्परा के अनुसार पहले शिवलिंग और उसके बाद माँ पाउडी की पूजा होती है।

CIA के टॉप 10 सीक्रेट ऑपरेशन




1.म्यांमार सीमा के अंदर की गई भारतीय सेना की कार्रवाई उजागर करने को लेकर काफी हो हल्ला मचा। ये पहली बार नहीं है कि भारतीय सेना ने ऐसी कोई कार्रवाई की हो। दुनिया के अन्य देश काफी बड़ी कार्रवाइयां करते रहे हैं। आज इस कड़ी में दुनिया के सबसे खतरनाक जासूसी संगठन सीआईए(अमेरिका) के टॉप 10 सीक्रेट मिलिटरी ऑपरेशनों के बारे में बताते  है, जिनके बारे में आपने शायद ही सुना हो। अगली स्लाइड्स में जानिए सीआईए के टॉप सीक्रेट ऑपरेशंस


2.अमेरिका की ये सबसे खतरनाक खुफिया चाल थी। जिसे दुनिया काफी बाद में समझ पाई। सीआईए ने 1978 में अफगानी सिविल वार के समय इस खतरनाक योजना को अंजाम दिया। दरअसल, उस समय अफगानिस्तान पर कब्जे को लेकर दो कम्युनिस्ट शक्तियां लड़ रही थीं, जिनके सफाए के लिए अमेरिका ने एंटी कम्युनिस्ट विद्रोहियों को तमाम मदद दी। मुजाहिद्दीन को ट्रेनिंग दी, पैसा और हथियार दिए। लड़ाकू विमानों को भी मार गिरा देने की शक्ति दी। हालांकि बाद में ये अमेरिका के लिए ही घातक सिद्ध हुआ लेकिन उस समय अमेरिका की पूरी रणनीति सफल रही और सोवियत रूसी सेना को पीछे हटना पड़ा।

3.फ्योनिक्स कार्यक्रम को सीआईए ने स्पेशल अमेरिकी फोर्स, ऑस्ट्रेलियन फोर्स और दक्षिण वियतनामी कमांडरों के साथ मिलकर वियतनाम युद्ध के समय चलाया था। इसके तहत उत्तर वियतनामी फौज को नहीं, बल्कि उन आम लोगों को निशाना बनाया गया, जो कम्युनिस्ट को लेकर थोड़ी भी सहानुभूति रखते थे। फ्योनिक्स कार्यक्रम के तहत हजारों आम लोगों का अपहरण किया गया, यातनाएं दी गईं, यहां तक कि मौत के घाट उतार दिया गया। इस दौरान महिलाओं के साथ गैंगरेप किया गया, सांपों से डसाया गया, बिजली के झटके दिए गए, यहां तक कि संवेदनशील अंगों को शरीर से अलग कर दिया गया। लोगों को कुत्तों से कटवाया गया, तो घोड़ों के टापुओं से रौंद दिया गया। इसकी असलियत खुलने के बाद इसे बंद कर दिया गया, इसकी जगह एफ-6 कार्यक्रम ने ले ली।

4.इस ऑपरेशन को अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने 1960 के दशक से वियतनाम युद्ध के काफी बाद तक चलाया। इसके तहत छात्रों तक पर निगाह रखी गई और विरोध की आवाज उठते ही लोगों को जेलों में ठूंस दिया गया। ऑपरेशन केऑस के तहत लाखों अमेरिकियों की जासूसी की गई। ये कार्यक्रम वाटरगेट प्रकरण के बाद बंद कर दिया गया। इसी तरह चलाए गए एक कार्यक्रम का 2011 में खुलासा हुआ, जब सीआईए पर आरोप लगे कि वो अमेरिकी मुस्लिमों की जासूसी कर रही है।

5.सीआईए का ये ऑपरेशन काफी सफल रहा। ऑपरेशन मॉकिंगबर्ड के तहत सैकड़ों पत्रकारों की नियुक्ति सीआईए ने की और उन्हें तमाम सुविधाएं उपलब्ध कराकर पूरी दुनिया की जासूसी कराई। पत्रकार के पकड़े जाने पर कोई भय भी नहीं था, क्योंकि अमेरिकी सरकार इसे खोजी पत्रकारिता का नाम दे देती थी। ऑपरेशन मॉकिंगबर्ड से अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए को दुनिया भर में विरोधियों की तमाम गतिविधियों का पता चलता रहा। इस कार्यक्रम के खुलने के बाद काफी अमेरिकी पत्रकारों की हत्याएं अमेरिका विरोधी देशों में हुईं। डेनियल पर्ल जैसे मारे गए पत्रकार पर भी सीआईए एजेंट होने के आरोप लगे। ऑपरेशन मॉकिंगबर्ड के खुलने के बाद ईमानदार पत्रकारों की जिंदगी पर भी बन आई और पत्रकारिता खतरनाक पेशों में शुमार हो गई।

6.सीआईए ने पाकिस्तान के एटबाबाद में अल-कायदा के मुखिया ओसामा बिन लादेन को मारने से पहले उसकी पहचान सुनिश्चित की। जिसके लिए एटबाबाद में लंबे समय तक टीकाकरण कर डीएनए एकत्रित किए। ये सीआईए का खास कार्यक्रम था, जिसके दम पर ओसामा की पहचान और फिर खात्मा हो सका। पूरे ऑपरेशन को दुनिया ने तब जाना, जब ओसामा को अमेरिकी स्पेशल ऑपरेशन टीम ने मार गिराया।

7.भूमिगत परमाणु ऊर्जा चालित शहर बनाने की योजना सीआईए की थी, जो ग्रीनलैंड में बनाई गई थी। ग्रीनलैंड आधिकारिक रूप से अमेरिका का हिस्सा नहीं है, इसके बावजूद बर्फ के नीचे 200 लोगों के रहने के लिए ये शहर बनाया गया। जहां परमाणु हमले की स्थिति में भी सुरक्षित रहा जा सके। इस छोटे से शहर का पता लगाना बेहद मुश्किल था। जहां जिम, लाइब्रेरी, थिएटर जैसी सुविधाएं थीं। यहां वैज्ञानिकों को रखा गया था। इसे बाद में एक डॉक्यूमेंटरी में भी दिखाया गया। इसे बाद में फौज के हवाले कर दिया गया, जहां 600 परमाणु मिसाइलों को रखा जाना था। इस तरह से रूस पर हमला आसानी से किया जा सकता था, जिसका रूस के पास कोई जवाब नहीं था। लेकिन इसे रूस की किस्मत समझें या कुछ और। तकनीकी खामियों की वजह से इस कार्यक्रम को बंद कर दिया गया, क्योंकि इस जगह को ठंडा बनाए रखने की वजह से 120 टन बर्फ हर माह नष्ट कर दी जाती थी। ये पर्यावरण के लिहाज से भी बेहद घातक सिद्ध हुई ।

8.ये कार्यक्रम सीआईए की तरफ से डोमेस्टिक ऑपरेशंस डिवीजन(डीओडी) ने चलाया। इसके तहत सीआईए के लिए खतरा बन सकने वाले उन सभी लोगों की जासूसी की गई, जो सीआईए का विरोध कर सकते थे। ऐसे लोगों की सूची बनाए जाने के साथ ही उनके अतीत की जानकारियां भी जुटाई गईं। प्रोजेक्ट रेसिस्टेंस के दौरान कई लोग रहस्यमय ढंग से गायब हो गए, जिनका अबतक पता नहीं चल सका है।

9.स्टारगेट प्रोजेक्ट अमेरिकी सरकार की तरफ से चलाया गया कार्यक्रम था। जिसके तहत दुश्मनों या विरोधी देशों के सैन्य ठिकानों पर दूरदर्शी उपकरणों की मदद से नजर रखी जाती थी। इसे रिमोट व्यूविंग प्रोग्राम के तहत चलाया गया। जॉर्ज जी मॉएड के किले को सैन्य हेडक्वार्टर में बदल दिया गया। बाद में मामले का खुलासा होने पर प्रोजेक्ट को 1995 में बंद कर दिया गया।


10.ऑपरेशन क्यूफायर को ग्वाटेमाला में चलाया गया, जिसके तहत कम्युनिस्ट नेताओं पर नजर रखी गई। इसी कार्यक्रम की मदद से चे-ग्वेरा को बोलिवियनों ने पकड़ लिया और टॉर्चर करके मौत के घाट उतार दिया। चे-ग्वेरा से मामले के जुड़ने और चे के मारे जाने के बाद सीआईए की काफी बदनामी हुई। हालांकि सीआईए का ये प्रोजेक्ट काफी सफल रहा।


11.ऑपरेशन वॉशटब को सीआईए ने ग्वाटेमाला को सोवियत संघ का नजदीकी बताकर बदनाम करने के लिए चलाया था। इसके तहत सीआईए ने निकारागुआ में फर्जी रूसी जंगी जहाज तैनात कराए। भले ही ऑपरेशन वॉशटब पूरी तरह से सफल नहीं हुआ, पर उस दौरान ग्वाटेमाला को खासी बदनामी उठानी पड़ी। इसी नाम से 1950 के दशक में फ्लोरिडा में भी सीआईए ने ऐसा ही प्रोजेक्ट चलाया। जिसमें 1950-1959 के बीच 89 प्रशिक्षित एजेंट्स सोवियत संघ के प्रशासन को भेदने के लिए भेजे गए। इस प्रोजेक्ट का खुलासा 2014 में अमेरिकी सरकार द्वारा जारी दस्तावेजों से हुआ

जानिए भारत के तीन सबसे घातक ज़हरीले सांपों के बारे में जो है सबसे ज्यादा मौतों के जिम्मेदार

सांप को लेकर हमारे समाज में कई भ्रम हैं और उतना ज्यादा ही डर भी है। अकसर लोगों को पता नहीं होता कि सांप जहरीला है या नहीं। सांप दिखते ही लोगों के मन में डर बैठ जाता है। हमारे आसपास कई तरह के सांप दिखते हैं लेकिन ये सभी जहरीले नहीं होते। भारत में मुख्यत: तीन तरह के जहरीले सांप हैं, जो अकसर इंसानी बस्ती में पाए जाते हैं। ये हैं रसेल वाइपर, कोबरा और करैत। इन तीनों सांपों में सबसे खतरनाक जहर करैत का होता है।

कोबरा – काला सांप होता है। इसके फन से इसकी पहचान आसानी से की जा सकती है।
रसेल वाइपर – देसी भाषा में इसे दीगड़ भी कहते हैं। भूरे रंग का सांप होता है और उस पर काले रंग के गोल धब्बे होते हैं। इसके फुंफकारने की आवाज काफी तेज होती है, जिसे दस से बीस फीट दूर से सुना जा सकता है।
करैत : यह सांप पतला और काले रंग का हाेता है। काले रंग के साथ-साथ इसकी चमड़ी पर सफेद रंग की धारी भी होती है।
 
इन तीन सांपाें के काटने से होती है सबसे ज्यादा मौत
सर्प विशेषज्ञों के अनुसार कोबरा, रसेल वाइपर और करैत के काटने से ज्यादा मौतें होती हैं। इन सांपों का जहर इतना खतरनाक होता है कि इसकी एक बूंद ही 20 से 25 लोगों को मौत की नींद सुला सकती है। इनके अलावा किंग कोबरा, गोल्डन कोबरा सहित अन्य जहरीले सांप भी भारत में पाए जाते हैं लेकिन इंसानी बस्ती में ये सांप कम ही मिलते हैं।

सांप के काटने पर लगती है खूब प्यास, आती है नींद
सर्प विशेषज्ञों के अनुसार यदि सांप ने काट लिया हो और कोई इसे देख नहीं पाया हो, तो शरीर के इन लक्षणों से समझा जा सकता है कि जहरीले सांप ने काटा है। उन्होंने बताया कि सांप का जहर शरीर में जाने के बाद खून के थक्के जमने लगते हैं। साथ ही, गला सूखने लगता है और खूब प्यास लगती है। इसके साथ ही नींद भी आती है। जहां सांप काटता है, वहां सुई के चुभने जैसा दर्द होता है और थोड़ा-सा खून आता है।

सांप काटे तो क्या करें और क्या न करें
यदि सांप काट ले तो जिस जगह सांप ने काटा है, उसके पास एक चीरा लगा लें। साथ ही काटने की जगह के दोनों तरफ कस के बांध लें। इससे जहर शरीर में नहीं फैलेगा। इन सबके साथ आधे घंटे के अंदर तुरंत डॉक्टर के पास जाएं। झाड़-फूंक के चक्कर में न पड़ें। जहरीला सांप काटने पर बार-बार आंख बंद होती है, नींद आती है। इस बात का ख्याल रखना है कि आपकी नींद न लग जाए।
ये चर्चित सांप नहीं होते जहरीले :
घोड़ा पछाड़ : भूरे रंग का होता है। मान्यता है कि यह उड़ता है, लेकिन ऐसा नहीं है। यह सांप जम्प मारता है। यह सांप मोटा और काफी बड़ा होता है, लेकिन जहरीला नहीं होता।
दो मुहां : काले रंग का सांप होता है। ज्यादातर समय सुस्त पड़ा रहता है। इसका मुहं और पूंछ एक जैसे आकार की होने के कारण इसे दो मुहां सांप भी कहते हैं, लेकिन इसका एक ही मुंह होता है। यह सांप काटता भी नहीं है। अकसर रेतीली जमीन पर मिलता है।